जयराम रमेश बोले—सर्वदलीय बैठक बुलाकर 2029 से लागू हो महिला आरक्षण, ‘परिसीमन की साजिश’ का लगाया आरोप
नई दिल्ली, 28 अप्रैल 2026। देश की राजनीति में महिला आरक्षण और परिसीमन को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और महासचिव जयराम रमेश ने प्रधानमंत्री पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि सरकार ने लोकसभा के परिसीमन को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश की, लेकिन विपक्ष की एकजुटता के कारण यह प्रयास विफल हो गया। उन्होंने मांग की है कि अब सरकार को महिला आरक्षण कानून को लागू करने के लिए ठोस पहल करनी चाहिए और इस विषय पर सर्वदलीय बैठक बुलानी चाहिए।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर जारी अपने विस्तृत बयान में जयराम रमेश ने कहा कि अब जबकि चुनाव प्रचार समाप्त हो चुका है और परिसीमन को लेकर सरकार की “चालाकी भरी कोशिश” नाकाम हो गई है, तो प्रधानमंत्री को विपक्ष की उस मांग पर ध्यान देना चाहिए जो मार्च 2026 के मध्य से लगातार उठाई जा रही है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में सहमति और संवाद की भूमिका अहम होती है, ऐसे में सरकार को एकतरफा निर्णय लेने के बजाय सभी दलों को साथ लेकर चलना चाहिए।
कांग्रेस नेता ने अपने बयान में विशेष रूप से नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 का उल्लेख करते हुए कहा कि इस कानून को 16 अप्रैल 2026 की देर रात “घबराहट में अधिसूचित” किया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने इसे बिना व्यापक चर्चा और तैयारी के लागू करने की कोशिश की, जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया के अनुरूप नहीं है। रमेश ने सुझाव दिया कि इस कानून को 2029 से लोकसभा की मौजूदा सीटों की संख्या के साथ लागू किया जा सकता है, बशर्ते इसके लिए सभी राजनीतिक दलों के बीच सहमति बनाई जाए।
अब जबकि चुनाव प्रचार समाप्त हो चुका है और लोकसभा के खतरनाक परिसीमन को जबरन लागू करने की उनकी चालाकी भरी कोशिश विपक्ष की एकजुटता और सामूहिकता के कारण बुरी तरह विफल हो गई है, अब समय आ गया है कि प्रधानमंत्री वही करें, जिसकी मांग विपक्ष मार्च 2026 के मध्य से एकजुट होकर लगातार करता आ…
— Jairam Ramesh (@Jairam_Ramesh) April 28, 2026
उन्होंने स्पष्ट कहा कि इस विषय पर चर्चा के लिए एक सर्वदलीय बैठक बुलाई जानी चाहिए। उनके अनुसार, यह न केवल संभव है बल्कि लोकतांत्रिक दृष्टि से वांछनीय और आवश्यक भी है। उन्होंने कहा कि महिला आरक्षण जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे को राजनीतिक लाभ-हानि के नजरिए से नहीं बल्कि सामाजिक न्याय और समानता के दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए।
जयराम रमेश ने केंद्र सरकार पर यह भी आरोप लगाया कि संसद के विशेष सत्र के दौरान महिला आरक्षण वास्तव में मुख्य मुद्दा था ही नहीं। उनके अनुसार, उस समय का वास्तविक एजेंडा परिसीमन था, जिसे प्रधानमंत्री के “राजनीतिक संरक्षण” के लिए आगे बढ़ाया जा रहा था। उन्होंने कहा कि सरकार ने महिला आरक्षण को एक राजनीतिक औजार के रूप में इस्तेमाल किया, जिससे इस महत्वपूर्ण मुद्दे की गंभीरता कम हुई।
कांग्रेस नेता ने अपने बयान में प्रधानमंत्री से तीखा सवाल करते हुए कहा कि अब समय आ गया है कि वे देश की महिलाओं के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाएं। उन्होंने आरोप लगाया कि महिलाओं का इस्तेमाल निजी राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए किया गया, जो न केवल अनुचित है बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ भी है। उन्होंने कहा कि सरकार को “प्रायश्चित” करते हुए महिलाओं को उनका अधिकार दिलाना चाहिए।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बयान ऐसे समय में आया है जब देश में महिला आरक्षण और परिसीमन को लेकर व्यापक बहस चल रही है। एक ओर सरकार इसे ऐतिहासिक कदम बता रही है, वहीं विपक्ष इसे राजनीतिक रणनीति का हिस्सा मान रहा है। इस मुद्दे ने आगामी चुनावों के मद्देनजर राजनीतिक दलों के बीच टकराव को और तेज कर दिया है।
विशेषज्ञों के अनुसार, महिला आरक्षण कानून का प्रभावी क्रियान्वयन कई जटिल प्रक्रियाओं से जुड़ा हुआ है, जिनमें परिसीमन भी शामिल है। परिसीमन के तहत लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण किया जाता है, जिससे सीटों की संख्या और उनका वितरण प्रभावित होता है। ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि क्या बिना परिसीमन के महिला आरक्षण लागू किया जा सकता है या इसके लिए पहले परिसीमन आवश्यक है।
कांग्रेस का तर्क है कि महिला आरक्षण को मौजूदा सीटों के साथ भी लागू किया जा सकता है और इसके लिए किसी बड़े बदलाव की आवश्यकता नहीं है। वहीं सरकार का पक्ष यह रहा है कि परिसीमन के बाद ही इस कानून को प्रभावी रूप से लागू किया जा सकेगा, ताकि आरक्षण का सही संतुलन सुनिश्चित किया जा सके।
इस पूरे विवाद के बीच सर्वदलीय बैठक की मांग को एक महत्वपूर्ण राजनीतिक पहल के रूप में देखा जा रहा है। यदि सरकार इस मांग को स्वीकार करती है, तो इससे संवाद का रास्ता खुल सकता है और इस जटिल मुद्दे का कोई सर्वमान्य समाधान निकल सकता है। हालांकि, यह भी स्पष्ट है कि इस मुद्दे पर राजनीतिक सहमति बनाना आसान नहीं होगा, क्योंकि इसमें विभिन्न दलों के हित और रणनीतियां जुड़ी हुई हैं।
महिला संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी इस मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। उनका कहना है कि महिला आरक्षण लंबे समय से लंबित मांग रही है और इसे अब और टाला नहीं जाना चाहिए। उन्होंने राजनीतिक दलों से अपील की है कि वे इस मुद्दे को राजनीतिक विवाद से ऊपर उठकर देखें और महिलाओं को समान प्रतिनिधित्व दिलाने के लिए मिलकर काम करें।
इस बीच, भाजपा की ओर से अभी तक जयराम रमेश के बयान पर कोई औपचारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन पार्टी के नेताओं ने पहले भी यह स्पष्ट किया है कि महिला आरक्षण कानून सरकार की प्राथमिकता है और इसे लागू करने के लिए आवश्यक सभी कदम उठाए जाएंगे।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा और अधिक गरमा सकता है। विपक्ष जहां सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश करेगा, वहीं सरकार अपने रुख पर कायम रह सकती है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या सर्वदलीय बैठक की मांग पर कोई ठोस निर्णय लिया जाता है या यह मुद्दा राजनीतिक बयानबाजी तक ही सीमित रह जाता है।
अंततः, यह विवाद केवल राजनीतिक नहीं बल्कि सामाजिक महत्व का भी है। महिला आरक्षण देश में लैंगिक समानता की दिशा में एक बड़ा कदम माना जाता है, और इसका प्रभाव आने वाले वर्षों में देश की राजनीति और समाज दोनों पर पड़ सकता है। ऐसे में यह आवश्यक है कि इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार किया जाए और ऐसा समाधान निकाला जाए जो सभी पक्षों के लिए स्वीकार्य हो।
फिलहाल, जयराम रमेश के बयान ने इस बहस को एक नई दिशा दे दी है और अब सबकी नजरें केंद्र सरकार के अगले कदम पर टिकी
