नई दिल्ली, 17 अप्रैल। लोकसभा में महिला आरक्षण को परिसीमन से जोड़ने वाले संविधान संशोधन विधेयक के गिरने के बाद देश की राजनीति में तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है। कांग्रेस ने इस घटनाक्रम को केंद्र सरकार की “असंवैधानिक चाल” की हार और लोकतंत्र व संविधान की जीत करार दिया है। पार्टी के शीर्ष नेताओं—मल्लिकार्जुन खरगे, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा और जयराम रमेश —ने एक सुर में सरकार पर हमला बोला और विपक्ष की एकजुटता को लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के रूप में प्रस्तुत किया।
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि मोदी-शाह ने देश की आधी आबादी—महिलाओं—को एक “ढाल” बनाकर परिसीमन लागू करने की कोशिश की, जो लोकतंत्र, संविधान और संघीय ढांचे पर सीधा प्रहार था। खड़गे के मुताबिक, यह प्रयास न केवल राजनीतिक रूप से संदिग्ध था बल्कि संवैधानिक मूल्यों के भी विपरीत था।
मोदी-शाह ने देश की आधी आबादी को ढाल बनाकर Delimitation करने की कोशिश की और इस देश के लोकतंत्र, संविधान और Federalism को चोट पहुँचाने का कुत्सित प्रयास किया।
उनकी ये चालबाज़ी एकजुट विपक्ष — INDIA ने भाँप ली और संविधान संशोधन बिल गिर गया। हम सभी विपक्षी दलों के नेताओं का हृदय से…
— Mallikarjun Kharge (@kharge) April 17, 2026
खड़गे ने दावा किया कि सरकार की इस “चालबाज़ी” को विपक्षी गठबंधन INDIA ने समय रहते समझ लिया और एकजुट होकर इसका विरोध किया, जिसके परिणामस्वरूप संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में पारित नहीं हो सका। उन्होंने कहा कि यह विपक्ष की सामूहिक जीत है और कांग्रेस सभी सहयोगी दलों के नेताओं का आभार व्यक्त करती है, जिन्होंने इस मुद्दे पर एकजुटता दिखाई।
अपने बयान में खड़गे ने तीखा हमला करते हुए कहा कि मोदी और शाह अपनी राजनीति चमकाने के लिए भारत के लोकतंत्र को “तबाह” करने चले थे, लेकिन उनकी यह “साज़िश औंधे मुंह गिर गई।” उन्होंने यह भी कहा कि यह घटनाक्रम इस बात का प्रमाण है कि जब विपक्ष एकजुट होता है, तो वह लोकतंत्र को कमजोर करने वाली किसी भी कोशिश को विफल कर सकता है।
यह महिला आरक्षण बिल नहीं है – इसका महिलाओं से कोई संबंध नहीं।
यह बिल OBC विरोधी है,
यह बिल SC-ST विरोधी है,
यह बिल Anti National है – दक्षिण, उत्तर-पूर्व, उत्तर-पश्चिम और छोटे राज्यों के खिलाफ है।हम भारत जोड़ने वाले न किसी का हक़ छिनने देंगे, न देश को बंटने देंगे। pic.twitter.com/9tAUMZOI9g
— Rahul Gandhi (@RahulGandhi) April 17, 2026
महिला आरक्षण के मुद्दे पर कांग्रेस ने सरकार से अपनी मांग दोहराई। खड़गे ने कहा कि 2023 में पारित Nari Shakti Vandan Adhiniyam के तहत महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण 2029 के आम चुनावों से ही लागू किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि कांग्रेस सितंबर 2023 से लगातार यह मांग कर रही है और अब यह प्रधानमंत्री की “नारी शक्ति” के प्रति प्रतिबद्धता की असली परीक्षा है।
वहीं लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इस पूरे घटनाक्रम को संविधान पर हमला करार दिया। संसद परिसर में पत्रकारों से बातचीत करते हुए उन्होंने कहा कि यह वास्तव में महिला आरक्षण बिल नहीं था, बल्कि भारत के राजनीतिक और चुनावी ढांचे को बदलने की कोशिश थी। उनके मुताबिक, यह विधेयक संविधान के मूल सिद्धांतों को कमजोर करने का प्रयास था, जिसे विपक्ष ने सफलतापूर्वक रोक दिया।
राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री को चुनौती देते हुए कहा कि यदि सरकार वास्तव में महिलाओं को आरक्षण देना चाहती है, तो 2023 का महिला आरक्षण कानून तत्काल प्रभाव से लागू करे। उन्होंने आश्वासन दिया कि इस मुद्दे पर पूरा विपक्ष सरकार का “100 प्रतिशत समर्थन” करेगा। उन्होंने यह भी कहा कि महिलाओं के अधिकारों को लेकर कोई भी राजनीति नहीं होनी चाहिए और इसे ईमानदारी से लागू किया जाना चाहिए।
बाद में X पर पोस्ट करते हुए राहुल गांधी ने खुशी जताई कि संशोधन विधेयक गिर गया। उन्होंने लिखा कि मोदी सरकार ने महिलाओं के नाम पर संविधान को तोड़ने के लिए असंवैधानिक तरीके अपनाए, लेकिन विपक्ष ने इसे रोक दिया। उन्होंने “संविधान की जय” का नारा देते हुए कहा कि यह लोकतंत्र की जीत है और देश ने देख लिया कि एकजुट विपक्ष किस तरह सरकार को चुनौती दे सकता है।
कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने भी सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि जिस तरह से महिला आरक्षण को प्रस्तुत किया गया, उसका पारित होना “नामुमकिन” था। उनके अनुसार, भाजपा सरकार ने इस मुद्दे को परिसीमन और पुरानी जनगणना से जोड़कर इसे जटिल बना दिया, जिसमें ओबीसी वर्ग को शामिल नहीं किया गया था। उन्होंने स्पष्ट किया कि कांग्रेस ऐसी व्यवस्था से कभी सहमत नहीं हो सकती।
प्रियंका गांधी ने कहा कि आज जो हुआ, वह देश के लोकतंत्र और उसकी अखंडता के लिए “बहुत बड़ी जीत” है। उन्होंने भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा कि जिन मुद्दों पर सरकार को कार्रवाई करनी चाहिए थी—जैसे हाथरस, उन्नाव और मणिपुर—वहां सरकार विफल रही, लेकिन अब महिला हितों की बात कर रही है। उन्होंने इसे “विरोधाभासी राजनीति” करार दिया।
अपने सोशल मीडिया पोस्ट में प्रियंका गांधी ने कहा कि संसद और विधानसभाओं में महिला आरक्षण महिलाओं का अधिकार है और इसे कोई नहीं रोक सकता। उन्होंने विश्वास जताया कि एक दिन यह हकीकत बनेगा। हालांकि, उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने इसे 2011 की जनगणना और परिसीमन से जोड़कर महिलाओं के हितों को टालने की कोशिश की, जो अंततः विफल रही।
प्रियंका गांधी ने विपक्ष की एकजुटता की सराहना करते हुए कहा कि आज का दिन भारतीय राजनीति में ऐतिहासिक माना जाएगा। उन्होंने कहा कि विपक्ष ने अपनी शक्ति का सही उपयोग करते हुए लोकतंत्र और देशहित को प्राथमिकता दी। उनके अनुसार, यदि ये विधेयक पारित हो जाते, तो देश के लोकतांत्रिक ढांचे पर गंभीर असर पड़ सकता था।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और संचार विभाग के प्रभारी जयराम रमेश ने भी इस मुद्दे पर विस्तार से प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री और गृह मंत्री द्वारा महिलाओं के आरक्षण को परिसीमन के “खतरनाक प्रस्तावों” से जोड़ने का प्रयास एक कुटिल राजनीतिक रणनीति थी, जिसे लोकसभा में निर्णायक रूप से पराजित कर दिया गया। उन्होंने इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था, संघीय ढांचे और संविधान की जीत बताया।
जयराम रमेश ने यह भी कहा कि सरकार के लिए अब रास्ता स्पष्ट है—उसे 2029 के चुनावों से पहले मौजूदा लोकसभा संरचना में ही महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करना चाहिए। उन्होंने याद दिलाया कि सितंबर 2023 में संसद द्वारा सर्वसम्मति से पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम के बाद से ही विपक्ष लगातार इसकी मांग कर रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह पूरा विवाद केवल महिला आरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे व्यापक राजनीतिक और संवैधानिक प्रश्न जुड़े हुए हैं। परिसीमन की प्रक्रिया, जो जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण से संबंधित है, लंबे समय से एक संवेदनशील मुद्दा रही है। यदि इसे संतुलित और पारदर्शी तरीके से लागू नहीं किया गया, तो यह क्षेत्रीय असंतुलन और राजनीतिक प्रतिनिधित्व में असमानता को जन्म दे सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि दक्षिण भारत और उत्तर-पूर्वी राज्यों में लंबे समय से यह चिंता रही है कि जनसंख्या आधारित परिसीमन से उनकी राजनीतिक शक्ति कम हो सकती है, जबकि अधिक जनसंख्या वाले राज्यों का प्रभाव बढ़ सकता है। यही कारण है कि विपक्ष इस मुद्दे को लेकर विशेष रूप से सतर्क है और सरकार से स्पष्टता की मांग कर रहा है।
वहीं केंद्र सरकार पहले यह कह चुकी है कि महिला आरक्षण का उद्देश्य राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना है और यह एक ऐतिहासिक कदम है। हालांकि, विपक्ष का आरोप है that इसे लागू करने में जानबूझकर देरी की जा रही है और इसे जटिल प्रक्रियाओं से जोड़कर टालने की कोशिश की जा रही है।
लोकसभा में विधेयक के गिरने के बाद यह मुद्दा अब और अधिक राजनीतिक महत्व प्राप्त कर चुका है। आने वाले चुनावों में महिला आरक्षण, सामाजिक न्याय और संघीय ढांचे जैसे मुद्दे प्रमुख भूमिका निभा सकते हैं। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इसे सरकार की “नीतिगत विफलता” के रूप में पेश कर रहे हैं, जबकि भाजपा इसे अलग नजरिए से देखने की कोशिश कर सकती है।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत में लोकतंत्र केवल संख्याबल का खेल नहीं है, बल्कि इसमें संवैधानिक मूल्यों, राजनीतिक संतुलन और जनप्रतिनिधित्व की अहम भूमिका होती है। विपक्ष की एकजुटता ने यह दिखाया है कि यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति हो, तो किसी भी विवादास्पद प्रस्ताव को रोका जा सकता है।
अंततः, अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि केंद्र सरकार आगे क्या कदम उठाती है। क्या वह विपक्ष की मांग मानते हुए महिला आरक्षण को जल्द लागू करेगी, या फिर इस मुद्दे पर राजनीतिक टकराव और बढ़ेगा—यह आने वाला समय ही बताएगा। फिलहाल, लोकसभा में इस विधेयक का गिरना भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देखा जा रहा है, जिसने लोकतंत्र, संविधान और महिलाओं के अधिकारों को लेकर एक नई बहस को जन्म दिया है।
