कार्यक्रम में दिखी सनातन जागरण की झलक, संस्कृति-संस्कार के संरक्षण पर दिया बल
लखनऊ 28 फरवरी। राज्यसभा सांसद एवं उत्तर प्रदेश के पूर्व उपमुख्यमंत्री डॉ. दिनेश शर्मा ने कहा कि भारत आज वैश्विक मंच पर तेज़ी से आगे बढ़ रहा है और दुनिया का नेतृत्व करने की दिशा में दृढ़ कदमों से बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि सदियों तक भारत पर कई आक्रांताओं ने आक्रमण किया और देश की संपदा को लूटने का प्रयास किया, लेकिन वे भारत की संस्कृति, परंपराओं और संस्कारों को कभी समाप्त नहीं कर सके। यही भारतीय सभ्यता की सबसे बड़ी शक्ति है।

डॉ. दिनेश शर्मा लखनऊ में आयोजित एक सांस्कृतिक एवं सामाजिक कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि भारत की संस्कृति और परंपराओं को सुरक्षित रखने में समाज के उस वर्ग की महत्वपूर्ण भूमिका रही है, जिसने सदैव धर्म, ज्ञान और परंपराओं की रक्षा का दायित्व निभाया। उन्होंने कहा कि वेदों के अध्ययन-अध्यापन, धार्मिक स्थलों की रक्षा और समाज को संस्कार देने का कार्य करने वाले लोगों ने भारतीय संस्कृति को अक्षुण्ण बनाए रखा।

उन्होंने कहा कि इतिहास में ऐसे कई दौर आए जब भारत की सामाजिक संरचना को कमजोर करने की कोशिशें की गईं। मुगलों और अंग्रेजों ने समाज को जातियों में बांटने का प्रयास किया, ताकि सनातन परंपरा के अनुयायी एकजुट न हो सकें। समाज की एकता को कमजोर करने के लिए सबसे पहले उन लोगों को निशाना बनाया गया, जो शास्त्रों का अध्ययन करते थे और धर्म एवं संस्कृति के संरक्षण का कार्य करते थे।
डॉ. शर्मा ने कहा कि जिन लोगों को समाज में ब्राह्मण कहा जाता है, उन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी समाज को जोड़ने का कार्य किया। उन्होंने समाज में संवाद, संस्कार और धार्मिक परंपराओं को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने कहा कि भारत की सामाजिक संरचना में प्रत्येक वर्ग की अपनी-अपनी जिम्मेदारी और भूमिका रही है, जिसके माध्यम से समाज को संगठित रखा गया।
उन्होंने विवाह संस्कार का उदाहरण देते हुए कहा कि भारतीय परंपराओं में हर वर्ग की अलग-अलग भूमिका निर्धारित की गई है। विवाह जैसे सामाजिक और धार्मिक आयोजनों में समाज के विभिन्न वर्गों की भागीदारी यह दर्शाती है कि भारतीय संस्कृति मूल रूप से समावेशी और एकजुट करने वाली है। यह व्यवस्था समाज के हर व्यक्ति को एक सूत्र में बांधती है।

डॉ. दिनेश शर्मा ने कहा कि ब्राह्मण समाज का मूल दायित्व परंपराओं को सहेजना, सनातन धर्म और समाज को जोड़ना तथा देवी-देवताओं के सम्मान की रक्षा करना रहा है। उन्होंने कहा कि आज के समय में जातीय विभाजन की बजाय समाज को एकजुट करने की आवश्यकता है। सनातन संस्कृति का मूल संदेश ही यही है कि समाज एक साथ खड़ा होकर अपनी सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाए।
उन्होंने कहा कि लंबे समय बाद भारत में सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना का एक नया दौर दिखाई दे रहा है। देश के विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों में लोगों की बढ़ती भागीदारी इस बात का प्रमाण है कि समाज अपनी जड़ों की ओर लौट रहा है।

डॉ. शर्मा ने कहा कि पहले नए वर्ष जैसे अवसरों पर लोग बड़े-बड़े होटलों और क्लबों में आयोजित कार्यक्रमों में शामिल होते थे, लेकिन अब बड़ी संख्या में लोग मंदिरों में जाकर पूजा-अर्चना कर रहे हैं। यह परिवर्तन भारतीय समाज की सांस्कृतिक चेतना और धार्मिक आस्था के पुनर्जागरण को दर्शाता है।
उन्होंने कहा कि हाल के वर्षों में देश में कई ऐसे ऐतिहासिक कार्य हुए हैं, जिन्होंने भारत की सांस्कृतिक विरासत को नई पहचान दी है। अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर का निर्माण, काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर का विकास, उज्जैन में महाकाल लोक का निर्माण और विंध्यवासिनी धाम क्षेत्र का पुनर्विकास जैसे कार्य भारत की सांस्कृतिक धरोहर को नई ऊर्जा देने वाले हैं।
उन्होंने कहा कि नैमिषारण्य, मथुरा और चित्रकूट धाम जैसे पौराणिक स्थलों के विकास के माध्यम से देश में धार्मिक पर्यटन और सांस्कृतिक चेतना को भी बढ़ावा मिला है। इन सभी प्रयासों ने भारत की प्राचीन परंपराओं और आध्यात्मिक धरोहर को दुनिया के सामने नए रूप में प्रस्तुत किया है।
डॉ. दिनेश शर्मा ने कहा कि महाकुंभ और माघ मेले जैसे आयोजनों में जिस तरह करोड़ों श्रद्धालुओं की भागीदारी होती है, वह भारत की सांस्कृतिक एकता और आध्यात्मिक शक्ति का सबसे बड़ा उदाहरण है। इन आयोजनों के माध्यम से दुनिया ने सनातन संस्कृति की विशालता और जीवंतता को देखा है।
उन्होंने कहा कि आज का समय सनातन के जागरण का समय है। समाज को चाहिए कि वह अपनी परंपराओं, संस्कृति और संस्कारों के संरक्षण के लिए एकजुट होकर कार्य करे। यदि समाज संगठित रहेगा तो भारत न केवल सांस्कृतिक रूप से मजबूत बनेगा बल्कि वैश्विक नेतृत्व की दिशा में भी आगे बढ़ेगा।
कार्यक्रम के दौरान उन्होंने आयोजकों द्वारा समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों का सम्मान करने की पहल की भी सराहना की। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के कार्यक्रम समाज में समरसता और एकता का संदेश देते हैं। जब सभी वर्गों के लोग एक मंच पर आकर एक-दूसरे का सम्मान करते हैं, तो समाज में सकारात्मक वातावरण बनता है।
अंत में उन्होंने कहा कि भारत की शक्ति उसकी विविधता, संस्कृति और सामाजिक एकता में निहित है। यदि समाज इन मूल्यों को बनाए रखेगा तो आने वाले समय में भारत निश्चित रूप से विश्व का मार्गदर्शन करने वाला राष्ट्र बनेगा।
