कपास और दलहन उत्पादन में गिरावट/ठहराव, मखाना बोर्ड पर सुस्ती, रुपये की कमजोरी और बढ़ती लागत के बीच विपक्ष का हमला तेज
नई दिल्ली 21 मार्च। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने संसद में कृषि मंत्रालय से जुड़े सवाल उठाते हुए केंद्र सरकार की नीतियों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने कहा कि पिछले वर्षों में खेती-बाड़ी को लेकर जो बड़े-बड़े वादे किए गए, उनका जमीनी असर नजर नहीं आता। कपास, दलहन और मखाना जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों का हवाला देते हुए उन्होंने आरोप लगाया कि इन क्षेत्रों में न तो अपेक्षित वृद्धि हुई, न निवेश बढ़ा और न ही कोई स्पष्ट दीर्घकालिक विजन दिखाई देता है।
राहुल गांधी के इस बयान ने एक बार फिर देश में कृषि नीति, उत्पादन क्षमता, किसानों की आय और महंगाई जैसे मुद्दों पर राजनीतिक बहस को तेज कर दिया है। उन्होंने कहा कि सरकार की घोषणाएं कागजों और भाषणों तक सीमित रह गई हैं, जबकि जमीनी सच्चाई इससे बिल्कुल अलग है।
कपास उत्पादन में गिरावट: नीति पर सवाल
राहुल गांधी ने कपास उत्पादन के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि वर्ष 2020-21 में जहां उत्पादन 35.2 मिलियन मीट्रिक टन (MMT) था, वह 2024-25 में घटकर 29.7 MMT रह गया है। यह गिरावट केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि कृषि नीति की दिशा पर गंभीर सवाल खड़ा करती है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि कपास उत्पादन में गिरावट के पीछे कई कारण हो सकते हैं—जैसे जलवायु परिवर्तन, कीटों का प्रकोप, बढ़ती लागत और किसानों को पर्याप्त लाभ न मिलना। लेकिन विपक्ष का आरोप है कि सरकार ने इन चुनौतियों से निपटने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए।
कपास केवल एक फसल नहीं, बल्कि देश के टेक्सटाइल उद्योग की रीढ़ है। उत्पादन घटने का असर कपड़ा उद्योग, निर्यात और रोजगार पर भी पड़ता है। यदि उत्पादन में लगातार गिरावट जारी रहती है, तो भारत को अधिक आयात करना पड़ेगा, जिससे व्यापार घाटा बढ़ सकता है।
दलहन उत्पादन में ठहराव: आत्मनिर्भरता पर असर
दलहन के उत्पादन को लेकर भी राहुल गांधी ने चिंता जताई। उनके अनुसार, 2020-21 में दलहन उत्पादन 25.5 MMT था, जो 2024-25 में केवल 25.7 MMT तक ही पहुंच पाया है। यह वृद्धि इतनी मामूली है कि इसे ठहराव कहा जा सकता है।
भारत जैसे देश में, जहां दालें आम आदमी के भोजन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, उत्पादन में ठहराव का मतलब है कि देश को आयात पर निर्भर रहना पड़ेगा। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर सीधे घरेलू उपभोक्ताओं पर पड़ता है।
विपक्ष का कहना है कि अगर सरकार ने समय रहते उत्पादन बढ़ाने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए, तो भविष्य में दालों की कीमतों में भारी उछाल देखने को मिल सकता है।
मखाना बोर्ड: घोषणा बनाम हकीकत
मखाना क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने बड़े स्तर पर मखाना बोर्ड बनाने की घोषणा की थी। इसे बिहार और पूर्वी भारत के किसानों के लिए एक बड़ी पहल बताया गया था। लेकिन राहुल गांधी का आरोप है कि इस योजना की स्थिति बेहद निराशाजनक है।
रुपये का डॉलर के मुकाबले कमजोर होकर 100 की तरफ बढ़ना और इंडस्ट्रियल फ्यूल की कीमतों में तेज़ बढ़ोतरी – ये सिर्फ आंकड़े नहीं, आने वाली महंगाई के साफ संकेत हैं।
सरकार चाहे इसे “नॉर्मल” बताए, लेकिन हकीकत ये है:
• उत्पादन और ट्रांसपोर्ट महंगे होंगे
• MSMEs को सबसे ज्यादा चोट…— Rahul Gandhi (@RahulGandhi) March 21, 2026
उन्होंने कहा कि घोषित बजट का केवल लगभग 5 प्रतिशत, यानी करीब ₹27 करोड़ ही जारी किया गया है, जबकि बोर्ड का स्थान तक तय नहीं हो पाया है। इससे यह सवाल उठता है कि क्या यह योजना केवल घोषणा तक ही सीमित रह गई है।
मखाना एक उभरता हुआ कृषि उत्पाद है, जिसकी देश और विदेश दोनों बाजारों में मांग बढ़ रही है। ऐसे में इस क्षेत्र में निवेश की कमी किसानों के लिए अवसरों को सीमित कर सकती है।
आयात पर बढ़ती निर्भरता: किसानों के लिए दोहरी मार
कपास और दलहन जैसे प्रमुख कृषि उत्पादों के उत्पादन में गिरावट या ठहराव का सीधा असर आयात पर निर्भरता के रूप में सामने आता है। राहुल गांधी ने कहा कि जब घरेलू उत्पादन पर्याप्त नहीं होता, तो सरकार को आयात करना पड़ता है।
इसका असर किसानों और उपभोक्ताओं दोनों पर पड़ता है। एक तरफ किसानों को अपने उत्पादों के लिए उचित कीमत नहीं मिलती, क्योंकि सस्ता आयात बाजार में उपलब्ध होता है। दूसरी तरफ उपभोक्ताओं को कीमतों में अस्थिरता का सामना करना पड़ता है।
रुपये की कमजोरी: महंगाई का संकेत
राहुल गांधी ने आर्थिक मोर्चे पर भी सरकार को घेरा। उन्होंने कहा कि रुपये का डॉलर के मुकाबले कमजोर होना और 100 के स्तर की ओर बढ़ना चिंता का विषय है। इसके साथ ही औद्योगिक ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी को उन्होंने आने वाली महंगाई का संकेत बताया।
आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार, जब रुपया कमजोर होता है, तो आयात महंगा हो जाता है। इससे कच्चे माल, ईंधन और अन्य आवश्यक वस्तुओं की लागत बढ़ती है, जिसका असर उत्पादन लागत पर पड़ता है।
MSME सेक्टर पर बढ़ता दबाव
राहुल गांधी ने कहा कि बढ़ती लागत का सबसे ज्यादा असर MSME सेक्टर पर पड़ेगा। ये छोटे और मध्यम उद्यम पहले से ही कई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, और लागत बढ़ने से उनकी स्थिति और खराब हो सकती है।
यदि उत्पादन और परिवहन महंगे होते हैं, तो MSMEs के लिए प्रतिस्पर्धा करना मुश्किल हो जाएगा, जिससे रोजगार पर भी असर पड़ सकता है।
राहुल गांधी ने चेतावनी दी कि आने वाले समय में रोजमर्रा की चीजों के दाम बढ़ सकते हैं। उन्होंने कहा कि यह केवल आर्थिक आंकड़े नहीं हैं, बल्कि हर परिवार की जेब पर इसका सीधा असर पड़ेगा।
उन्होंने यह भी आशंका जताई कि चुनाव के बाद पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की कीमतों में बढ़ोतरी की जा सकती है, जिससे महंगाई का दबाव और बढ़ेगा।
FII और शेयर बाजार पर असर
राहुल गांधी के अनुसार, विदेशी संस्थागत निवेशक (FII) भी ऐसी परिस्थितियों में अपना पैसा निकाल सकते हैं। इससे शेयर बाजार पर दबाव बढ़ सकता है और निवेशकों को नुकसान हो सकता है।
सरकार की नीतियों पर सीधा हमला
राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि Narendra Modi सरकार के पास न तो स्पष्ट दिशा है और न ही कोई ठोस रणनीति। उन्होंने कहा कि सरकार की योजनाएं केवल दिखावे के लिए बनाई जाती हैं, जबकि उनका जमीनी असर नहीं दिखता।
उनका कहना था कि हर बार किसानों की उपेक्षा देखने को मिलती है, जिससे यह स्पष्ट हो जाता है कि सरकार की प्राथमिकता में किसान नहीं हैं।
हालांकि सरकार की ओर से इस पर विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन पहले भी केंद्र सरकार यह दावा करती रही है कि उसने किसानों की आय बढ़ाने, उत्पादन बढ़ाने और कृषि क्षेत्र को मजबूत करने के लिए कई योजनाएं लागू की हैं।
सरकार का कहना रहा है कि जलवायु परिवर्तन, वैश्विक बाजार और अन्य बाहरी कारकों का भी कृषि उत्पादन पर असर पड़ता है।
राजनीतिक और आर्थिक बहस के बीच असली सवाल
इस पूरे मुद्दे के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सरकार की नीतियां वास्तव में किसानों और आम जनता के हित में हैं, या फिर वे केवल घोषणाओं तक सीमित रह जाती हैं।
कृषि क्षेत्र में उत्पादन की स्थिति, आर्थिक संकेतकों में बदलाव और महंगाई की आशंका—ये सभी संकेत बताते हैं कि आने वाले समय में चुनौतियां और बढ़ सकती हैं।
थाली और जेब का सवाल
राहुल गांधी ने अपने बयान के अंत में एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया—“सवाल यह नहीं कि सरकार क्या कह रही है, सवाल यह है कि आपकी थाली में क्या बचा है।”
यह सवाल केवल राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि देश के हर नागरिक की रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ा हुआ मुद्दा है। जब कृषि उत्पादन, आयात, महंगाई और रोजगार जैसे मुद्दे एक साथ सामने आते हैं, तो उनका असर सीधे आम आदमी की थाली और जेब पर पड़ता है।
आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इन आरोपों का कैसे जवाब देती है और क्या वह कृषि और अर्थव्यवस्था से जुड़ी चुनौतियों का समाधान निकाल पाती है या नहीं। फिलहाल, इस मुद्दे ने राजनीति से लेकर आम जनता तक एक व्यापक बहस को जन्म दे दिया है।
