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	<title>Supreme court of India Archives - Samvaad India</title>
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	<title>Supreme court of India Archives - Samvaad India</title>
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		<title>सुप्रीम कोर्ट के कोटा विद इन कोटा के फैसले ने क्या खोला जातीय जनगणना का रास्ता?</title>
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		<dc:creator><![CDATA[संवाद इंडिया]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 02 Aug 2024 09:52:49 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[उत्तर प्रदेश]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>(वसिंद्र मिश्र) नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ का फैसला भारत के अलग-अलग राजनीतिक दलों के लिए</p>
<p>The post <a href="https://www.samvaadindia.com/did-the-supreme-courts-decision-on-quota-with-these-quotas-open-the-way-for-caste-census/">सुप्रीम कोर्ट के कोटा विद इन कोटा के फैसले ने क्या खोला जातीय जनगणना का रास्ता?</a> appeared first on <a href="https://www.samvaadindia.com">Samvaad India</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>(वसिंद्र मिश्र) नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ का फैसला भारत के अलग-अलग राजनीतिक दलों के लिए एक कैच 22 की स्थिति पैदा कर दिया है भारतीय जनता पार्टी की सरकार की तरफ से संविधान पीठ के सामने एससी एसटी के अंदर उप वर्गीकरण का सुझाव दिया गया था संविधान पीठ ने अपने ऐतिहासिक फैसले में एससी-एसटी के अंदर कोटा विद इन कोटा या हम कहें कि क्रीमी लेयर का फार्मूला लागू करने का सुझाव दिया है संविधान पीठ ने साफ कर दिया है कि आजादी के इतने साल बाद भी एससी एसटी जातियों में अभी भी छुआछूत बरकरार है और एससी एसटी वर्ग के अंदर तमाम ऐसी जातियां हैं जो उसी वर्ग के दूसरी जातियों के साथ में छुआछूत में विश्वास रखती है भेदभाव करती है इसलिए जो जातियां अती दलित है अति कमजोरी है उनको वरीयता दी जानी चाहिए और उनका एक वर्गीकरण करके आरक्षण की सुविधा सबसे पहले उनको दी जानी चाहिए सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले का तमिलनाडु, तेलंगाना राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने स्वागत किया है लेकिन बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने इस फैसले का विरोध किया है उनका कहना है कि एससी एसटी वर्ग में अभी भी सामाजिक आर्थिक पिछलापन ज्यादा है इसलिए कोटा विद इन कोटा व्यवस्था लागू नहीं किया जाना चाहिए उनका कहना है कि संविधान पीठ का फैसला व्यावहारिक नहीं है अब मायावती के अपने तर्क हो सकते हैं उनके अपने पॉलिटिकल कंपल्शन हो सकते हैं इसी तरह के पॉलिटिकल कंपल्शन बाकी राजनीतिक दलों का भी हो सकता है लेकिन भारतीय जनता पार्टी की सरकार की तरफ से और सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ की तरफ वर्गीकरण का फैसला आ गया है और सरकार ने भी कहा है की सुप्रीम कोर्ट के फैसले को माननें में उनको कोई एतराज नहीं है लेकिन अब देखना है की किस तरह से ये फैसला लागू होगा।</p>
<p>सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में राज्यों को अधिकार दिया है कि वह अपने-अपने राज्यों में सामाजिक स्थिति का आकलन करके कास्ट और सब कास्ट के एक रिपोर्ट तैयार करें और उस आधार पर अपने अपने राज्यों में एससी एसटी के अंदर कोटा विद इन कोटा लागू करें हम सब जानते हैं कि बिहार में नीतीश कुमार की सरकार ने कई साल पहले महादलित और अति पिछड़ों को लेकर एक वर्गीकरण किया था और उस आधार पर बिहार में आरक्षण की व्यवस्था की थी कहा जाता है नीतीश कुमार का यही ट्रंप कार्ड था जिसके चलते हुए लगातार बिहार के राजनीतिक में रेलीवेंट बने हुए हैं और जब-जब चुनाव होता है तो उनको दलित समाज का अति पिछड़ा या अति गरीब कहिए या महा दलित कहिए नितेश कुमार को वोट देता है और पिछड़ों में भी जो अति पिछड़ा है वह नीतीश कुमार को वोट देता है भारत में कोटा विद इन कोटा लागू करने की शुरुआत 1975 में पंजाब की सरकार ने किया था और उसके देखा देखी आंध्र प्रदेश की सरकार ने भी लागू करने की कोशिश की थी लेकिन इन दोनों राज्य सरकारों के उसे निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी गई थी और सुप्रीम कोर्ट ने 2004 में पांच जज की पीठ ने पंजाब और आंध्र प्रदेश सरकार के उसे कोटा विद इन कोटा या वर्गीकरण करने संबंधी फैसले को खारिज कर दिया था और इस तरह से जो पुरानी व्यवस्था थी एससी एसटी पूरे समुदाय को आरक्षण देने की वह अभी तक चली आ रही थी उसके बाद प्रकरण संविधान पीठ के सामने गया और संविधान पीठ ने कई वर्षों तक सुनवाई करने के बाद 1 अगस्त को अपना फैसला सुनाया है सात जजों की संविधान पीठ में से 6 न्यायाधीशों ने कोटा विद इन कोटा या हम कहें क्रीमी लेयर जातियों के वर्गीकरण और उप वर्गीकरण का फैसला सुनाया है और साथ जज में से एक जज जस्टिस वेला त्रिवेदी ने मेजोरिटी फैसले के खिलाफ अपने राय जाहिर की भारत के मुख्य न्यायाधीश डिवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता में गठित इस संविधान पीठ ने अपने फैसले में 1917 और 1932 में अंग्रेजी हुकूमत के दौरान एससी-एसटी को लेकर कराए गए सर्वे और उन सर्वे रिपोर्ट्स का हवाला दिया डिवाई चंद्रचूड़ ने अपने विस्तृत फैसले में लिखा है कि ब्रिटिश टाइम में भी जो रिपोर्ट पेश हुई थी उसमें एससी एसटी के अंदर छुआ छुआ और जातियों के अंदर भेदभाव की पुष्टि की गई तो 1917 और 1932 की दो रिपोर्ट और उसके बाद के जितने भी विभिन्न डाटा आज अवेलेबल है उसके आधार पर संविधान पीठ ने फैसला सुनाया है कि क्रीमी लेयर की व्यवस्था लागू की जानी चाहिए जातियों के अंदर वर्गीकरण की व्यवस्था लागू होनी चाहिए और एससी-एसटी के अंदर जो सबसे ज्यादा कमजोर है जो पिछड़े हैं उनको आरक्षण की सुविधा मिलनी चाहिए संविधान पीठ के एक जज ने तो यह भी सुझाव दिया है कि एक बार जिस परिवार को आरक्षण की सुविधा मिल गई हो उसको दोबारा इसकी सुविधा नहीं मिलनी चाहिए अब इस तरह का फैसला आने के बाद जो आरक्षण विरोधी तत्व रहे हैं जो शुरू से आरक्षण का विरोध करते रहे हैं जातीय आधार पर उनको एक नया तर्क मिल गया है अपनी बात और मजबूती से रखने के लिए और जब ओबीसी के अंदर क्रीमी लेयर का फार्मूला लागू करने का जजमेंट आया था तब भी और अब एससी एसटी के अंदर जब क्रीमी लेयर और वर्गीकरण के फैसले को लागू करने का सुझाव आया है तब भी ऐसी ताकत है जो आरक्षण का विरोध करती है उनको एक नई एनर्जी मिली है एक नई ऊर्जा मिली है समाज के अंदर अपनी बात करने के लिए। लेकिन अगर संविधान पीठ के फैसले पर गंभीरता से स्टडी किया जाए उसे पर विचार किया जाए तो एक बात सबसे जो महत्वपूर्ण निकलकर आ रही है कि संविधान पीठ ने कहा है कि पता लगाइए जनगणना कराकर एससी एसटी के अंदर एक वर्गीकरण किया जाना चाहिए भारत सरकार पिछले कई वर्षों से जातीय जनगणना को टाल रही है पहले कोविड का सहारा लेकर जनगणना को टाल दिया गया था और अब जब गैर भाजपा सभी पार्टियां जाति आधार पर जनगणना की मांग कर रही है राहुल गांधी अखिलेश यादव तेजस्वी यादव सहित इंडिया एलायंस के ज्यादातर घटक दलों की तरफ से जातीय जनगणना को लेकर चुनाव में भी मुद्दा बनाया गया था और चुनाव परिणाम आने के बाद भी संसद के अंदर और बाहर मुद्दा बनाने की बात की जा रही है तो अब सरकार ऐसी स्थिति में क्या फैसला लेती है यह देखने की बात है क्योंकि भारत के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में गठित संविधान पीठ का फैसला अगर सरकार लागू करना चाहेगी तो उसे स्थिति में उसको सभी कमजोर वर्गों को पता लगाने के लिए एक सर्वे करना पड़ेगा एक जनगणना करना पड़ेगा और वह जनगणना तभी हो सकता है जब जातीय जनगणना पूरे देश में कराई जाए जिसकी मांग इंडिया एलायंस के सभी दल कर रहे हैं तो अब देखना है कि पहली बात यह की संविधान पीठ के इस फैसले का देश के कौन-कौन से राजनीतिक दल खुले तौर पर सपोर्ट कर रहे हैं कौन-कौन से राजनीतिक दल इसमें अपनी अलग राय रखता है और दूसरा अगर सरकार जिस तरह से कोर्ट के अंदर उप वर्गीकरण का वकालत कर चुकी है अगर इस स्टैंड पर कायम रहती है तो फिर उसकी जातिय जनगणना के दिशा में पहल करनी पड़ेगी और अगर वह जाति जनगणना की दिशा में पहल करती है तो राहुल गांधी से लेकर अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव का जो पॉलीटिकल स्टैंड है कि वह जाति जनगणना को इसी संसद में पारित कराने की कोशिश करेंगे उनके इस दावे को बल मिलेगा और उसका पॉलीटिकल माइलेज इंडिया एलायंस की पार्टियां लेने की कोशिश करेंगी।</p>
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		<title>पहली बारिश में ही अयोध्या में हुए निर्माण कार्यो ने प्रधानमंत्री के साथ-साथ मुख्यमंत्री की साख पर भी लगाया बट्टा</title>
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		<dc:creator><![CDATA[संवाद इंडिया]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 30 Jun 2024 16:55:22 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>(वसिंद्र मिश्र) लखनऊ। अयोध्या एक बार फिर चर्चा में है इस बार चर्चा में रहने का सबसे बड़ा</p>
<p>The post <a href="https://www.samvaadindia.com/the-construction-work-done-in-ayodhya-in-the-first-rain-itself-tarnished-the-credibility-of-the-prime-minister-as-well-as-the-chief-minister/">पहली बारिश में ही अयोध्या में हुए निर्माण कार्यो ने प्रधानमंत्री के साथ-साथ मुख्यमंत्री की साख पर भी लगाया बट्टा</a> appeared first on <a href="https://www.samvaadindia.com">Samvaad India</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>(वसिंद्र मिश्र) लखनऊ। अयोध्या एक बार फिर चर्चा में है इस बार चर्चा में रहने का सबसे बड़ा कारण दो दिन पहले हुई बारिश है। बारिश के चलते अयोध्या में आई तबाही है अयोध्या जो कि पूरी दुनिया में चर्चा का विषय रहा। कुछ महीने पहले तक हो रहे राम मंदिर निर्माण को लेकर राम मंदिर में हुई प्राण प्रतिष्ठा को लेकर राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के दिन पूरे देश दुनिया से जुटे अति विशिष्ट मेहमानों के चलते। आज वही अयोध्या चर्चा में है वहां खराब प्रशासन को लेकर, खराब बुनियादी ढांचा को लेकर, जल निकासी को लेकर, जलभराव को लेकर, नवनिर्मित सड़कों के धंस जाने को लेकर, नए बने रेलवे स्टेशन के बाहर हुए जलभराव को लेकर, रेलवे स्टेशन के बाहरी दीवार के गिरने को लेकर। आखिर क्या कारण है कि जो अयोध्या कुछ महीने पहले तक पूरी दुनिया में अपने मेगा शो के आयोजन के लिए अपने वर्ल्ड क्लास इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए विश्व के सुंदरतम नगर के रूप में विकसित होने को लेकर चर्चा में था। वही अयोध्या खराब बुनियादी ढांचा को लेकर, जलभराव को लेकर, मोहल्ले में भारी गंदगी को लेकर पूरी दुनिया में और खासतौर से भारत में विवादों में है चर्चा में है। कार्यवाहियों का सिलसिला शुरू हो गया है जैसा कि हर दुर्घटना और हादसे के बाद होता है सरकारी तौर पर एक-दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाने का दौर भी शुरू हो गया। राज्य सरकार ने जो कार्यदाई एजेंसी थी उसके खिलाफ भी मामला दर्ज कर लिया है और उसके कर्ताधर्ताओं को नोटिस जारी किया है। इसके अलावा अयोध्या का विकास कार्य देख रहे हैं इंजीनियरों के खिलाफ कार्रवाई हुई है। प्रशासनिक अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई हुई है और जहां जहां जो खामियां नजर आई हैं उसको दुरुस्त करने की कार्रवाई युद्धस्तर पर चल रही है। लेकिन सवाल इतना ही नहीं है सवाल ये है कि जिस अयोध्या को विकसित करने के लिए इस अयोध्या को वर्ल्ड क्लास सिटी बनाने के लिए जिस अयोध्या को विश्व धरोहर के रूप में फिर से स्थापित करने के लिए हजारों करोड़ों रुपया खर्च किया गया सरकारी खजाने से। आखिर कहां लापरवाही रही कि वह अयोध्या इतने हजार करोड़ों रुपया खर्च करने के बावजूद बरसात के पहले ही दिन पूरी तरह से ध्वस्त होता दिखाई दिया उसका ढांचा चरमरा गया। जल निकासी का कहीं कोई व्यवस्था नहीं था।</p>
<p>नवनिर्मित राम मंदिर के अंदर भी पानी के टपकने की शिकायतें आई वहां के मुख्य पुजारी सतेंद्र दास ने आरोप लगा दिया कि बारिश की वजह से नवनिर्मित राम मंदिर के अंदर भी पानी टपका जिसको बाद में राम मंदिर न्यास और वहां के व्यवस्थापकों की तरफ से खंडन किया गया और कहा गया कि मंदिर के अंदर किसी भी तरह का कोई रिसाव या कोई खामी नहीं है। लेकिन मंदिर के बाहर चाहे राम पथ मार्ग का मामला हो या रेलवे स्टेशन के बाहर की व्यवस्था हो निर्माण कार्य हो या और भी तमाम इस तरह के जो इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में काम हुए पूरी तरह से एक ही दिन की बारिश में क्यों ध्वस्त होते दिखाई दिए है?</p>
<p>आखिर इसके लिए क्या केवल इंजीनियर्स ही जिम्मेदार है या सिर्फ प्रशासनिक अधिकारी जिम्मेदार है? क्या वहां जो कार्यदाई संस्था थी वह जिम्मेदार है? अखबारों में छपी खबरों पर अगर भरोसा किया जाए और सरकारी सूत्रों से जो जानकारी मिल रही है उस पर अगर भरोसा किया जाए तो बताया जा रहा है कि अयोध्या के पुनर्निर्माण के लिए उसके विकास के लिए उसको विश्व स्तर पर एक सबसे खूबसूरत शहर बनाने के लिए जिस एजेंसी को ठेका दिया गया था का सरोकार गुजरात से है और उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ से उस एजेंसी को भी नोटिस दिया गया अभियंताओं को कुछ को निलंबित किया जा चुका है और जांच की जिम्मेदारी मंडलायुक्त को सौंप दी है लेकिन बताया यह जा रहा है कि जिस चीफ इंजीनियर को जिम्मेदारी दी गई थी अयोध्या का कार्यभार देखने के लिए अयोध्या के विकास का भी पीडब्लूडी के उसी चीफ इंजीनियर के पास डुअल चार्ज था ब्रिज कॉरपोरेशन का उसी तरह से जिस एक अधिकारी को वहां एडवाइजर बनाया गया था उस अधिकारी की भूमिका भी संदेह के घेरे में है आखिर अयोध्या जी से संवेदनशील प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री की इस ड्रीम प्रोजेक्ट की जिम्मेदारी ऐसे लोगों को क्यों दी गई जिनके पास की एक से ज्यादा दायित्व था क्या उत्तर प्रदेश में काबिल अधिकारियों की कमी थी? क्या उत्तर प्रदेश में ऐसे योग्य अभियंताओं की कमी थी जिनको कि डेडिकेटेड तौर पर अयोध्या के पुनर्निर्माण उसके जीर्णोद्धार उसके सौंदर्यीकरण का दायित्व नहीं जा सकता था दूसरी जो सबसे बड़ी खामी प्रारंभिक तौर पर देखने को मिल रही है कि जल निगम की तरफ से पाइप तो जमीन के अंदर डाला गया लेकिन उसके जल निकास की व्यवस्था नहीं की गई इसी तरह से रेलवे स्टेशन जो पुराना रेलवे स्टेशन है और नया रेलवे स्टेशन जो बना उसके बीच में जल निकासी की व्यवस्था नहीं थी। कुछ लोग कह रहे हैं कि प्रोजेक्ट को पूरा करने में जल्दीबाजी की गई क्योंकि प्राण प्रतिष्ठा का कार्यक्रम समयबद्ध तरीके से होना था और अगर सारे मानकों को पूरा करके इस काम को किया जाता तो शायद प्राण प्रतिष्ठा का कार्य समयबद्ध तरीके से नहीं हो पाता। इसलिए जल्दीबाजी की गई निर्माण कार्यों में सीवेज और पानी का ड्रेनेज की व्यवस्था करने में और यही कारण रहा की जो पहली बारिश हुई तो वहां की पूरी की पूरी व्यवस्था चरमरा गई लेकिन कुछ लोग यहीं का है की ठेकेदारी में जिस तरह की कमीशन बाजी और भ्रष्टाचार हुआ जिस तरह से क्वालिटी के साथ समझौता किया गया जिस तरह से अधिकारियों की तरफ से जो सुपरवाइजिंग एजेंसी थी उनकी तरफ से अपने दायित्वों की अनदेखी की गई और ठेकेदारों को और कार्यदाई एजेंसी को पूरी तरह से छूट दे दी गई मनमाने तरीके से काम करने का उसी का नतीजा है की अयोध्या में एक तरह से हम कहें तो पूरी तरह से हजारों करोड़ रुपये की बर्बादी हो गई और मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री की छवि को भी बट्टा लगा और उनके साख को भी बट्टा लगा क्योंकि यह प्रोजेक्ट योगी आदित्यनाथ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ड्रीम प्रोजेक्ट था मुख्यमंत्री लगभग हर हफ्ते सीधे तौर पर अयोध्या जाते थे और वहां चल रहे विकास कार्यों की समीक्षा करते थे बावजूद इसके इतनी बड़ी चूक हुई और इस चूक के लिए वहां जो अभियंताओं को दंडित करके वहां जो कुछ ठेकेदारों को दंडित करके बड़ी खामियों पर पर्दा नहीं डाला जा सकता जिन खामियों की वजह से सरकारी खजाने का हजारों करोड़ रुपये बर्बाद हुआ है सरकारी खजाने की बर्बादी के साथ ही उत्तर प्रदेश सरकार के साख गिरी है और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के कार्य कुशलता और उनके नेतृत्व पर भी सवाल खड़ा किया गया है कि क्या मुख्यमंत्री का दबदबा मुख्यमंत्री का कंट्रोल अपने मातहत काम कर रहे अधिकारियों पर नहीं है क्या मुख्यमंत्री का इकबाल अब अधिकारियों और कार्यदाई एजेंसी पर से घटता जा रहा है तमाम ऐसे सवाल है इसका उत्तर खोजना जरूरी है और उन सभी लोगों के विरुद्ध कड़ी से कड़ी कार्रवाई होना चाहिए जिनके चलते कि उत्तर प्रदेश के साख पूरे देश में गिरी है दुनिया में यह पहली घटना नहीं है जब जीर्णोद्धार के नाम पर जो वहां काम हुए हैं इन कामों को लेके सरकारों की साख गिरी है इसके पहले मध्य प्रदेश में महाकाल उज्जैन में जब कॉरिडोर का निर्माण हुआ था और महाकाल के जीर्णोद्धार और कॉरिडोर के वक्त जिस एजेंसी को ठेका दिया गया था महाकाल कॉरिडोर को पूरा करने के लिए वहाँ जो सप्तऋषियों की मूर्तियां लगी थी वह मूर्तियां भी एक ही आधी तूफान में खंडित हो गई थीं महाकाल के बाहर लगी सब ऋषियों की मूर्तियों के मुड़ने की घटना भी पूरे देश में चर्चा की विषय रही और उसमें भी बताया गया था कि कार्यदायी एजेंसी का संबंध गुजरात से था बाद में उस कार्यदायी एजेंसी के खिलाफ क्या कार्रवाई हुई?</p>
<p>आखिर क्यों उन मानकों का पालन उस कार्यदायी एजेंसी ने नहीं किया जिन मानकों के तहत वहां मूर्तियों की स्थापना होनी थी ये तो मध्यप्रदेश की सरकार बताएगी वो कार्यदाई एजेंसी बताएगी। लेकिन ये अयोध्या की घटना ने महाकाल की उस घटना को ताजा कर दिया है उसकी याद को ताजा कर दिया है इसलिए सरकारी एजेंसियों को कार्यवाही संस्था को इस तरह के संवेदनशील परियोजनाओं में काम करते समय बेहद सावधानी और चौकसी बरतनी चाहिए जिससे उनकी किसी भी लापरवाही का खामियाजा सरकार के साख सरकार की छवि पर ना पड़े और सरकार को उसका नुकसान न उठाना पड़े।</p>
<p>The post <a href="https://www.samvaadindia.com/the-construction-work-done-in-ayodhya-in-the-first-rain-itself-tarnished-the-credibility-of-the-prime-minister-as-well-as-the-chief-minister/">पहली बारिश में ही अयोध्या में हुए निर्माण कार्यो ने प्रधानमंत्री के साथ-साथ मुख्यमंत्री की साख पर भी लगाया बट्टा</a> appeared first on <a href="https://www.samvaadindia.com">Samvaad India</a>.</p>
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