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	<title>कृषि Archives - Samvaad India</title>
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		<title>कृषि पर ‘बड़े वादे, कमजोर नतीजे’ का आरोप: राहुल गांधी ने उठाए सवाल, उत्पादन, निवेश और महंगाई पर सरकार घिरी</title>
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		<dc:creator><![CDATA[संवाद इंडिया]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 21 Mar 2026 17:07:14 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अंतरराष्ट्रीय]]></category>
		<category><![CDATA[एक्सक्लूसिव]]></category>
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		<category><![CDATA[Poor Results’ in Agriculture: Rahul Gandhi Raises Questions; Government Cornered over Production]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>कपास और दलहन उत्पादन में गिरावट/ठहराव, मखाना बोर्ड पर सुस्ती, रुपये की कमजोरी और बढ़ती लागत के बीच</p>
<p>The post <a href="https://www.samvaadindia.com/allegations-of-grand-promises-poor-results-in-agriculture-rahul-gandhi-raises-questions-government-cornered-over-production-investment-and-inflation/">कृषि पर ‘बड़े वादे, कमजोर नतीजे’ का आरोप: राहुल गांधी ने उठाए सवाल, उत्पादन, निवेश और महंगाई पर सरकार घिरी</a> appeared first on <a href="https://www.samvaadindia.com">Samvaad India</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>कपास और दलहन उत्पादन में गिरावट/ठहराव, मखाना बोर्ड पर सुस्ती, रुपये की कमजोरी और बढ़ती लागत के बीच विपक्ष का हमला तेज</strong><br />
नई दिल्ली 21 मार्च। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने संसद में कृषि मंत्रालय से जुड़े सवाल उठाते हुए केंद्र सरकार की नीतियों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने कहा कि पिछले वर्षों में खेती-बाड़ी को लेकर जो बड़े-बड़े वादे किए गए, उनका जमीनी असर नजर नहीं आता। कपास, दलहन और मखाना जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों का हवाला देते हुए उन्होंने आरोप लगाया कि इन क्षेत्रों में न तो अपेक्षित वृद्धि हुई, न निवेश बढ़ा और न ही कोई स्पष्ट दीर्घकालिक विजन दिखाई देता है।<br />
राहुल गांधी के इस बयान ने एक बार फिर देश में कृषि नीति, उत्पादन क्षमता, किसानों की आय और महंगाई जैसे मुद्दों पर राजनीतिक बहस को तेज कर दिया है। उन्होंने कहा कि सरकार की घोषणाएं कागजों और भाषणों तक सीमित रह गई हैं, जबकि जमीनी सच्चाई इससे बिल्कुल अलग है।<br />
<strong>कपास उत्पादन में गिरावट: नीति पर सवाल</strong><br />
राहुल गांधी ने कपास उत्पादन के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि वर्ष 2020-21 में जहां उत्पादन 35.2 मिलियन मीट्रिक टन (MMT) था, वह 2024-25 में घटकर 29.7 MMT रह गया है। यह गिरावट केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि कृषि नीति की दिशा पर गंभीर सवाल खड़ा करती है।<br />
विशेषज्ञ मानते हैं कि कपास उत्पादन में गिरावट के पीछे कई कारण हो सकते हैं—जैसे जलवायु परिवर्तन, कीटों का प्रकोप, बढ़ती लागत और किसानों को पर्याप्त लाभ न मिलना। लेकिन विपक्ष का आरोप है कि सरकार ने इन चुनौतियों से निपटने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए।</p>
<p>कपास केवल एक फसल नहीं, बल्कि देश के टेक्सटाइल उद्योग की रीढ़ है। उत्पादन घटने का असर कपड़ा उद्योग, निर्यात और रोजगार पर भी पड़ता है। यदि उत्पादन में लगातार गिरावट जारी रहती है, तो भारत को अधिक आयात करना पड़ेगा, जिससे व्यापार घाटा बढ़ सकता है।<br />
<strong>दलहन उत्पादन में ठहराव: आत्मनिर्भरता पर असर</strong><br />
दलहन के उत्पादन को लेकर भी राहुल गांधी ने चिंता जताई। उनके अनुसार, 2020-21 में दलहन उत्पादन 25.5 MMT था, जो 2024-25 में केवल 25.7 MMT तक ही पहुंच पाया है। यह वृद्धि इतनी मामूली है कि इसे ठहराव कहा जा सकता है।<br />
भारत जैसे देश में, जहां दालें आम आदमी के भोजन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, उत्पादन में ठहराव का मतलब है कि देश को आयात पर निर्भर रहना पड़ेगा। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में उतार-चढ़ाव का असर सीधे घरेलू उपभोक्ताओं पर पड़ता है।<br />
विपक्ष का कहना है कि अगर सरकार ने समय रहते उत्पादन बढ़ाने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए, तो भविष्य में दालों की कीमतों में भारी उछाल देखने को मिल सकता है।<br />
<strong>मखाना बोर्ड: घोषणा बनाम हकीकत</strong><br />
मखाना क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने बड़े स्तर पर मखाना बोर्ड बनाने की घोषणा की थी। इसे बिहार और पूर्वी भारत के किसानों के लिए एक बड़ी पहल बताया गया था। लेकिन राहुल गांधी का आरोप है कि इस योजना की स्थिति बेहद निराशाजनक है।</p>
<blockquote class="twitter-tweet" data-width="550" data-dnt="true">
<p lang="hi" dir="ltr">रुपये का डॉलर के मुकाबले कमजोर होकर 100 की तरफ बढ़ना और इंडस्ट्रियल फ्यूल की कीमतों में तेज़ बढ़ोतरी &#8211; ये सिर्फ आंकड़े नहीं, आने वाली महंगाई के साफ संकेत हैं।</p>
<p>सरकार चाहे इसे “नॉर्मल” बताए, लेकिन हकीकत ये है:</p>
<p>• उत्पादन और ट्रांसपोर्ट महंगे होंगे<br />• MSMEs को सबसे ज्यादा चोट…</p>
<p>&mdash; Rahul Gandhi (@RahulGandhi) <a href="https://twitter.com/RahulGandhi/status/2035312768736485606?ref_src=twsrc%5Etfw">March 21, 2026</a></p></blockquote>
<p><script async src="https://platform.twitter.com/widgets.js" charset="utf-8"></script></p>
<p>उन्होंने कहा कि घोषित बजट का केवल लगभग 5 प्रतिशत, यानी करीब ₹27 करोड़ ही जारी किया गया है, जबकि बोर्ड का स्थान तक तय नहीं हो पाया है। इससे यह सवाल उठता है कि क्या यह योजना केवल घोषणा तक ही सीमित रह गई है।<br />
मखाना एक उभरता हुआ कृषि उत्पाद है, जिसकी देश और विदेश दोनों बाजारों में मांग बढ़ रही है। ऐसे में इस क्षेत्र में निवेश की कमी किसानों के लिए अवसरों को सीमित कर सकती है।<br />
<strong>आयात पर बढ़ती निर्भरता: किसानों के लिए दोहरी मार</strong><br />
कपास और दलहन जैसे प्रमुख कृषि उत्पादों के उत्पादन में गिरावट या ठहराव का सीधा असर आयात पर निर्भरता के रूप में सामने आता है। राहुल गांधी ने कहा कि जब घरेलू उत्पादन पर्याप्त नहीं होता, तो सरकार को आयात करना पड़ता है।<br />
इसका असर किसानों और उपभोक्ताओं दोनों पर पड़ता है। एक तरफ किसानों को अपने उत्पादों के लिए उचित कीमत नहीं मिलती, क्योंकि सस्ता आयात बाजार में उपलब्ध होता है। दूसरी तरफ उपभोक्ताओं को कीमतों में अस्थिरता का सामना करना पड़ता है।<br />
<strong>रुपये की कमजोरी: महंगाई का संकेत</strong><br />
राहुल गांधी ने आर्थिक मोर्चे पर भी सरकार को घेरा। उन्होंने कहा कि रुपये का डॉलर के मुकाबले कमजोर होना और 100 के स्तर की ओर बढ़ना चिंता का विषय है। इसके साथ ही औद्योगिक ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी को उन्होंने आने वाली महंगाई का संकेत बताया।<br />
आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार, जब रुपया कमजोर होता है, तो आयात महंगा हो जाता है। इससे कच्चे माल, ईंधन और अन्य आवश्यक वस्तुओं की लागत बढ़ती है, जिसका असर उत्पादन लागत पर पड़ता है।<br />
<strong>MSME सेक्टर पर बढ़ता दबाव</strong><br />
राहुल गांधी ने कहा कि बढ़ती लागत का सबसे ज्यादा असर MSME सेक्टर पर पड़ेगा। ये छोटे और मध्यम उद्यम पहले से ही कई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, और लागत बढ़ने से उनकी स्थिति और खराब हो सकती है।<br />
यदि उत्पादन और परिवहन महंगे होते हैं, तो MSMEs के लिए प्रतिस्पर्धा करना मुश्किल हो जाएगा, जिससे रोजगार पर भी असर पड़ सकता है।<br />
राहुल गांधी ने चेतावनी दी कि आने वाले समय में रोजमर्रा की चीजों के दाम बढ़ सकते हैं। उन्होंने कहा कि यह केवल आर्थिक आंकड़े नहीं हैं, बल्कि हर परिवार की जेब पर इसका सीधा असर पड़ेगा।<br />
उन्होंने यह भी आशंका जताई कि चुनाव के बाद पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की कीमतों में बढ़ोतरी की जा सकती है, जिससे महंगाई का दबाव और बढ़ेगा।<br />
<strong>FII और शेयर बाजार पर असर</strong><br />
राहुल गांधी के अनुसार, विदेशी संस्थागत निवेशक (FII) भी ऐसी परिस्थितियों में अपना पैसा निकाल सकते हैं। इससे शेयर बाजार पर दबाव बढ़ सकता है और निवेशकों को नुकसान हो सकता है।<br />
सरकार की नीतियों पर सीधा हमला<br />
राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि Narendra Modi सरकार के पास न तो स्पष्ट दिशा है और न ही कोई ठोस रणनीति। उन्होंने कहा कि सरकार की योजनाएं केवल दिखावे के लिए बनाई जाती हैं, जबकि उनका जमीनी असर नहीं दिखता।<br />
उनका कहना था कि हर बार किसानों की उपेक्षा देखने को मिलती है, जिससे यह स्पष्ट हो जाता है कि सरकार की प्राथमिकता में किसान नहीं हैं।<br />
हालांकि सरकार की ओर से इस पर विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन पहले भी केंद्र सरकार यह दावा करती रही है कि उसने किसानों की आय बढ़ाने, उत्पादन बढ़ाने और कृषि क्षेत्र को मजबूत करने के लिए कई योजनाएं लागू की हैं।<br />
सरकार का कहना रहा है कि जलवायु परिवर्तन, वैश्विक बाजार और अन्य बाहरी कारकों का भी कृषि उत्पादन पर असर पड़ता है।<br />
राजनीतिक और आर्थिक बहस के बीच असली सवाल<br />
इस पूरे मुद्दे के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सरकार की नीतियां वास्तव में किसानों और आम जनता के हित में हैं, या फिर वे केवल घोषणाओं तक सीमित रह जाती हैं।<br />
कृषि क्षेत्र में उत्पादन की स्थिति, आर्थिक संकेतकों में बदलाव और महंगाई की आशंका—ये सभी संकेत बताते हैं कि आने वाले समय में चुनौतियां और बढ़ सकती हैं।<br />
<strong>थाली और जेब का सवाल</strong><br />
राहुल गांधी ने अपने बयान के अंत में एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया—“सवाल यह नहीं कि सरकार क्या कह रही है, सवाल यह है कि आपकी थाली में क्या बचा है।”<br />
यह सवाल केवल राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि देश के हर नागरिक की रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ा हुआ मुद्दा है। जब कृषि उत्पादन, आयात, महंगाई और रोजगार जैसे मुद्दे एक साथ सामने आते हैं, तो उनका असर सीधे आम आदमी की थाली और जेब पर पड़ता है।<br />
आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इन आरोपों का कैसे जवाब देती है और क्या वह कृषि और अर्थव्यवस्था से जुड़ी चुनौतियों का समाधान निकाल पाती है या नहीं। फिलहाल, इस मुद्दे ने राजनीति से लेकर आम जनता तक एक व्यापक बहस को जन्म दे दिया है।</p>
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		<title>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भारतीय कृषि व्यवस्था को सुदृढ़ करने की दिशा में अहम प्रयास</title>
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		<dc:creator><![CDATA[संवाद इंडिया]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 07 Nov 2024 00:05:20 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अंतरराष्ट्रीय]]></category>
		<category><![CDATA[कृषि]]></category>
		<category><![CDATA[ब्रेकिंग]]></category>
		<category><![CDATA[Narendra modi]]></category>
		<category><![CDATA[Prime Minister Narendra Modi's important effort towards strengthening the Indian agriculture system]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>नई दिल्ली 7 नवंबर। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (CCEA) ने</p>
<p>The post <a href="https://www.samvaadindia.com/prime-minister-narendra-modis-important-effort-towards-strengthening-the-indian-agriculture-system/">प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भारतीय कृषि व्यवस्था को सुदृढ़ करने की दिशा में अहम प्रयास</a> appeared first on <a href="https://www.samvaadindia.com">Samvaad India</a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>नई दिल्ली 7 नवंबर। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (CCEA) ने भारतीय खाद्य निगम (FCI) के कार्यशील पूंजी के लिए वित्तीय वर्ष 2024-25 में 10,700 करोड़ रुपये की इक्विटी लगाने के प्रस्ताव को मंजूरी दी है। इस निर्णय का उद्देश्य न केवल कृषि क्षेत्र को समर्थन देना है, बल्कि इसके माध्यम से किसानों के हितों को भी संरक्षित करना है। सरकार का यह कदम भारतीय कृषि व्यवस्था को सुदृढ़ करने की दिशा में एक अहम प्रयास है।</p>
<p><strong>भारतीय खाद्य निगम का इतिहास और भूमिका</strong></p>
<p>भारतीय खाद्य निगम (FCI) की स्थापना 1964 में की गई थी, जिसका उद्देश्य न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर खाद्यान्नों की खरीद, रणनीतिक भंडारण, कल्याणकारी योजनाओं हेतु खाद्यान्न का वितरण और बाजार में आवश्यक खाद्यान्न की उपलब्धता सुनिश्चित करना है। अपने प्रारंभिक वर्षों में FCI ने 100 करोड़ रुपये की अधिकृत पूंजी और 4 करोड़ रुपये की इक्विटी के साथ कार्य शुरू किया था। इसके बाद से इसके परिचालन में अभूतपूर्व विस्तार हुआ, जिसके परिणामस्वरूप फरवरी 2023 में इसकी अधिकृत पूंजी 11,000 करोड़ रुपये से बढ़कर 21,000 करोड़ रुपये कर दी गई।</p>
<p><strong>FCI की वित्तीय चुनौतियाँ और सरकार का सहयोग</strong></p>
<p>समय के साथ FCI को विभिन्न वित्तीय चुनौतियों का सामना करना पड़ा। इसमें बड़ी मात्रा में अल्पकालिक उधार शामिल है, जिसे कार्यशील पूंजी की कमी को पूरा करने के लिए लिया जाता है। इन अल्पकालिक ऋणों पर लगने वाले ब्याज से FCI पर आर्थिक दबाव बढ़ा है। इसे कम करने के उद्देश्य से ही भारत सरकार ने 10,700 करोड़ रुपये की महत्वपूर्ण इक्विटी संचार की मंजूरी दी है, जो FCI की आर्थिक स्थिति को मजबूत करेगी और इसके परिचालन को अधिक कुशल बनाएगी। इस इक्विटी से ब्याज के बोझ को कम करने में सहायता मिलेगी और सरकार की सब्सिडी पर दबाव कम होगा।</p>
<p><strong>खाद्य सुरक्षा और MSP आधारित खरीद का महत्व</strong></p>
<p>FCI देश में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। MSP के आधार पर खाद्यान्न की खरीद से किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य मिलता है और यह उनके आर्थिक सशक्तिकरण में सहायक होता है। MSP पर आधारित खरीद प्रणाली कृषि क्षेत्र में स्थिरता और सुरक्षा प्रदान करती है। इस कदम के माध्यम से सरकार ने एक बार फिर से स्पष्ट कर दिया है कि कृषि क्षेत्र का विकास और किसानों का कल्याण उसकी प्राथमिकता है।</p>
<p><strong>सरकारी प्रतिबद्धता और आर्थिक दृष्टिकोण</strong></p>
<p>कृषि क्षेत्र की उन्नति के लिए सरकार का यह सहयोग न केवल एक आर्थिक निर्णय है, बल्कि यह किसानों की स्थिरता और कृषि अर्थव्यवस्था के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को भी दर्शाता है। सरकार द्वारा FCI के लिए दी गई यह इक्विटी भारतीय खाद्य निगम की क्षमता को बढ़ाएगी और उसे अपने अधिदेश को प्रभावी ढंग से पूरा करने में समर्थ बनाएगी।</p>
<p><strong>भविष्य की संभावनाएँ और FCI का महत्व</strong></p>
<p>FCI के परिचालन और भंडारण क्षमता में सुधार का सीधा लाभ कृषि क्षेत्र को मिलेगा। इस फैसले से यह सुनिश्चित होगा कि किसानों को उनके उत्पाद का समय पर उचित मूल्य मिले और देश में खाद्य पदार्थों की पर्याप्त उपलब्धता बनी रहे।</p>
<p><strong>एफसीआई का कार्यक्षेत्र और खाद्य आपूर्ति श्रृंखला पर असर</strong></p>
<p>एफसीआई का कार्यक्षेत्र काफी व्यापक है और इसका संचालन देशभर में फैला हुआ है। यह संस्थान न केवल फसल की खरीद करता है, बल्कि भंडारण और वितरण तक की जिम्मेदारी निभाता है। खासकर कल्याणकारी योजनाओं जैसे राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA), मध्याह्न भोजन योजना (मिड-डे मील) और अन्य राज्य सरकारों की खाद्य योजनाओं के लिए एफसीआई खाद्यान्न की आपूर्ति सुनिश्चित करता है। इस प्रकार, एफसीआई ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में खाद्य सुरक्षा के एक प्रमुख स्तंभ के रूप में कार्य करता है।</p>
<p>सरकार द्वारा दी गई नई इक्विटी FCI को इन सभी कार्यों को अधिक कुशलता से करने में सहायक होगी। इससे किसानों को तुरंत भुगतान सुनिश्चित होगा और वितरण प्रणाली को भी सुचारु रूप से चलाने में मदद मिलेगी।</p>
<p><strong>कृषि क्षेत्र में रोजगार और समृद्धि के नए अवसर</strong></p>
<p>भारत में कृषि क्षेत्र रोजगार का एक बड़ा स्रोत है और इस क्षेत्र में निवेश से रोजगार के नए अवसर उत्पन्न होते हैं। FCI का यह आर्थिक सशक्तिकरण न केवल मौजूदा कर्मचारियों और भंडारण कर्मियों को लाभान्वित करेगा, बल्कि इसके अंतर्गत अतिरिक्त रोजगार के अवसर भी उत्पन्न होंगे। इसके साथ ही कृषि से जुड़ी अन्य गतिविधियों, जैसे कि ट्रांसपोर्ट, भंडारण और वितरण में भी स्थानीय स्तर पर नौकरियों का सृजन होगा, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को और बल मिलेगा।</p>
<p><strong>किसानों को सशक्त बनाने में एमएसपी की भूमिका</strong></p>
<p>एमएसपी पर आधारित खरीद नीति किसानों के लिए एक बुनियादी सुरक्षा कवच का कार्य करती है। एमएसपी पर खरीद के जरिए किसानों को बाजार की अस्थिरता से बचाने का प्रयास किया जाता है, जिससे वे न्यूनतम मूल्य पर अपनी फसल बेच सकें। इससे न केवल किसानों की आय में स्थिरता आती है, बल्कि वे कृषि में नए प्रयोग और तकनीकी निवेश के प्रति भी प्रेरित होते हैं। इस प्रकार, एफसीआई का सशक्तिकरण एमएसपी नीति के प्रभावी कार्यान्वयन में सहायक होगा और किसानों को सीधे तौर पर आर्थिक सुरक्षा प्रदान करेगा।</p>
<p><strong>एफसीआई में संरचनात्मक सुधार और तकनीकी उन्नयन की संभावनाएं</strong></p>
<p>एफसीआई को मजबूत बनाने के लिए सरकार का यह कदम इसके संरचनात्मक सुधार और तकनीकी उन्नयन के लिए भी महत्वपूर्ण है। पिछले कुछ वर्षों में एफसीआई ने डिजिटल प्रौद्योगिकी और आईटी आधारित प्रणाली अपनाई है, जिससे कामकाज में पारदर्शिता और दक्षता में वृद्धि हुई है। नई इक्विटी से एफसीआई अपनी प्रौद्योगिकी को और भी मजबूत कर सकता है। ई-खरीद, ई-स्टोरेज और ई-डिस्ट्रीब्यूशन जैसी डिजिटल तकनीकों का उपयोग करके इसकी कार्यप्रणाली को और अधिक कुशल एवं पारदर्शी बनाया जा सकता है, जिससे लागत में कमी आएगी और कामकाज तेज होगा।</p>
<p><strong>भारत की खाद्य सुरक्षा और आत्मनिर्भरता की दिशा में कदम</strong></p>
<p>इस इक्विटी निवेश से एफसीआई देश की खाद्य सुरक्षा को सुदृढ़ बनाने में और अधिक प्रभावी भूमिका निभा सकेगा। खाद्य सुरक्षा केवल खाद्यान्न के उपलब्ध होने पर निर्भर नहीं है, बल्कि वितरण व्यवस्था और भंडारण की क्षमता भी इसमें महत्वपूर्ण योगदान देती है। एफसीआई के माध्यम से सरकार यह सुनिश्चित कर सकेगी कि भविष्य में किसी भी आपदा या अनाज की कमी के समय देशवासियों को आवश्यक खाद्य सामग्री समय पर और उचित मूल्य पर उपलब्ध कराई जा सके।</p>
<p>इस 10,700 करोड़ रुपये की इक्विटी का संचार एफसीआई के लिए वित्तीय मजबूती का एक महत्वपूर्ण चरण है, जो न केवल एफसीआई की परिचालन क्षमताओं को बढ़ाएगा, बल्कि यह देश के कृषि क्षेत्र को भी मजबूत करेगा। इस निवेश से कृषि क्षेत्र को स्थायित्व मिलेगा, किसानों को उचित समर्थन मिलेगा और भारत की खाद्य सुरक्षा प्रणाली अधिक सुदृढ़ होगी। यह कदम न केवल कृषि क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम है, बल्कि यह प्रधानमंत्री के आत्मनिर्भर भारत के सपने को साकार करने के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को भी दर्शाता है।</p>
<p>सरकार का यह रणनीतिक निर्णय देश के किसानों, कृषि क्षेत्र और खाद्य सुरक्षा के लिए एक नई दिशा और उन्नति की राह प्रस्तुत करता है। इसके सकारात्मक परिणाम दीर्घकालिक होंगे, जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था और समाज को मजबूत आधार मिलेगा।</p>
<p>The post <a href="https://www.samvaadindia.com/prime-minister-narendra-modis-important-effort-towards-strengthening-the-indian-agriculture-system/">प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भारतीय कृषि व्यवस्था को सुदृढ़ करने की दिशा में अहम प्रयास</a> appeared first on <a href="https://www.samvaadindia.com">Samvaad India</a>.</p>
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		<title>पराली न जलाकर करें यह काम अगली फसल में होगा ढाई गुना फायदा</title>
		<link>https://www.samvaadindia.com/do-this-work-by-not-burning-stubble-there-will-be-two-and-a-half-times-profit-in-the-next-crop/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[संवाद इंडिया]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 21 Mar 2024 12:45:02 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[उत्तर प्रदेश]]></category>
		<category><![CDATA[कृषि]]></category>
		<category><![CDATA[Crop]]></category>
		<category><![CDATA[Farmer]]></category>
		<category><![CDATA[Parali]]></category>
		<category><![CDATA[किसान]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>लखनऊ : चंद रोज बाद गेहूं की कटाई होने वाली है। कंबाइन से कटाई के बाद खेतों में</p>
<p>The post <a href="https://www.samvaadindia.com/do-this-work-by-not-burning-stubble-there-will-be-two-and-a-half-times-profit-in-the-next-crop/">पराली न जलाकर करें यह काम अगली फसल में होगा ढाई गुना फायदा</a> appeared first on <a href="https://www.samvaadindia.com">Samvaad India</a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>लखनऊ : चंद रोज बाद गेहूं की कटाई होने वाली है। कंबाइन से कटाई के बाद खेतों में ही फसल अवशेष जलाने की आम परंपरा रही है। हालांकि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के प्रयासों से इसमें काफी कमी आई है। सरकार पराली जलाने से पर्यावरण, जमीन की उर्वरता आगजनी के खतरे और पशुओं के चारे के आसन्न संकट को लेकर व्यापक जागरूकता अभियान चला रही है। साथ ही फसल अवशेष को सहजने के लिए अनुदान पर कृषि यंत्र इनकी कंपोस्टिंग के के बायो डी कंपोजर भी उपलब्ध करा रही है।</p>
<p>बावजूद इसके अगर गेंहू की कटाई के बाद खरीफ की अगली फसल लेने के बाबत सोच रहे हैं तो रुकिए और सोचिए। आप खेत के साथ अपनी किस्मत खाक करने जा रहे हैं। यह खुद के पांव में कुल्हाड़ी मारने जैसा है। क्योंकि डंठल के साथ फसल के लिए सर्वाधिक जरूरी पोषक तत्व नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश (एनपीके) के साथ अरबों की संख्या में भूमि के मित्र बैक्टीरिया और फफूंद भी जल जाते हैं। भूसे के रूप में पशुओं का हक तो मारा ही जाता है।</p>
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<strong>फसल अवशेष में है पोषक तत्वों का खजाना</strong></p>
<p>शोधों से साबित हुआ है कि बचे डंठलों में एनपीके की मात्रा क्रमश: 0.5, 0.6 और 1.5 फीसद होती है। जलाने की बजाए अगर खेत में ही इनकी कंपोस्टिंग कर दी जाय तो मिट्टी को एनपीके की क्रमश: 4 , 2 और 10 लाख टन मात्रा मिल जाएगी। भूमि के कार्बनिक तत्वों, बैक्टिरिया फफूंद का बचना, पर्यावरण संरक्षण और ग्लोबल वार्मिग में कमी बोनस होगा। अगली फसल में करीब 25 फीसद उर्वरकों की बचत से खेती की लागत में इतनी ही कमी आएगी और लाभ इतना ही बढ़ जाएगा।</p>
<p>गोरखपुर एनवायरमेंटल एक्शन गु्रप के एक अध्ययन के अनुसार प्रति एकड़ डंठल जलाने पर पोषक तत्वों के अलावा 400 किग्रा उपयोगी कार्बन, प्रतिग्राम मिट्टी में मौजूद 10-40 करोड़ बैक्टीरिया और 1-2 लाख फफूंद जल जाते हैं।</p>
<p>उप्र पशुधन विकास परिषद के पूर्व जोनल प्रबंधक डा. बीके सिंह के मुताबिक प्रति एकड़ डंठल से करीब 18 क्विंटल भूसा बनता है। सीजन में भूसे का प्रति क्विंटल दाम करीब 400 रुपए माना जाए तो डंठल के रूप में 7200 रुपये का भूसा नष्ट हो जाता है। बाद में यही चारा संकट का कारण बनता है।</p>
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<strong>फसल अवशेष के अन्य लाभ</strong></p>
<ul>
<li>&#8211;<strong>फसल अवशेष से ढकी मिट्टी का तापमान सम होने से इसमें सूक्ष्मजीवों की सक्रियता बढ़ जाती है,जो अगली फसल के लिए सूक्ष्म पोषक तत्व मुहैया कराते हैं।</strong></li>
<li>&#8211; <strong>अवशेष से ढकी मिट्टी की नमी संरक्षित रहने से भूमि के जल धारण की क्षमता भी बढ़ती है। इससे सिंचाई में कम पानी लगने से इसकी लागत घटती है। साथ ही दुर्लभ जल भी बचता है।</strong></li>
</ul>
<p>&nbsp;</p>
<p style="text-align: center;"><strong>क्या करें</strong></p>
<p>डंठल जलाने के बजाए उसे गहरी जुताई कर खेत में पलट कर सिंचाई कर दें। शीघ्र सड़न के लिए सिंचाई के पहले प्रति एकड़ 5 किग्रा यूरिया का बुरकाव कर सकते हैं। इसके लिए कल्चर भी उपलब्ध हैं। और कई तरह के कृषि यंत्र भी। सरकार का प्रयास है कि वह ऐसे प्लांट लगाए जिनमें पराली से बायो कंप्रेस्ड गैस और बेहतर गुणवत्ता की कंपोस्ट खाद बने। हाल ही में गोरखपुर के धुरियापार में एक ऐसे ही प्लांट का उद्घाटन हो चुका है। केंद्र सरकार की मदद से प्रदेश में ऐसे 100 प्लांट लगाने की योजना है। फिर तो ठूंठ से भी किसानों के ठाठ होंगे। स्थानीय स्तर पर लोगों को रोजगार मिलेगा। किसानों की आय भी बढ़ेगी। बड़ी मात्रा में बेहतर किस्म की कंपोस्ट मिलने से जैविक खेती को भी बढ़ावा मिलेगा।</p>
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